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विंध्याचल रेंज में बसा और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित चंदेरी शहर, गलियों की भूलभुलैया व पुरातात्विक इमारतों के खंडहर, जो कि इसके लंबे और घटनापूर्ण अतीत की गवाही हैं, से भरे है।

लिखित साक्ष्य के अभाव में इस पर कोई वास्तविक सहमति नहीं है कि कब चंदेरी के शहर को स्थापित किया गया था। इसका इतिहास मिथक और लोककथाओं से घनिष्ट रूप से जुड़ा हुआ है। एक किंवदंती का दावा है कि चंदेरी के शहर को शुरूआती वैदिक काल में भगवान कृष्ण के चचेरे भाई, राजा शिशुपाल, द्वारा स्थापित किया गया था। एक अन्य किवदंती इसकी स्थापना को राजा चेद से जोड़ते हैं, जो कहा जाता है कि इस क्षेत्र पर 600 ई.पू. के आसपास शासन करता था। सभी किंवदंतियों में सबसे व्यापक है, जल का ‘चमत्कार’, जिसे गुर्जर-प्रारतिहार वंश के राजा कृतिपाल ने देखा था, और उसने उसे पुराने चंदेरी (बूढ़ी चंदेरी) से अपनी राजधानी को सन् 1100 ई. के आसपास वर्तमान चंदेरी को लाने के लिये प्रेरित किया। ऐसा माना जाता है कि कृतिपाल एक झरने के पानी द्वारा कुष्ठ रोग से संयोगवश ठीक हो गया जहाँ वह एक शिकार अभियान के दौरान गया था। इससे राजा वह जगह जिसे अब वह पवित्र मानाता था में अपनी राजधानी को स्थानांतरित करने के लिए बाध्य किया। वही झरना परमेश्वर तालाब का स्रोत कहा जाता है।

8वीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहार राजवंश ने बूढ़ी चंदेरी पर अपनी संप्रभुता स्थापित की, और इसे एक आबादी वाला बनाया जिसमें बड़े शहर जैसे सभी राजचिह्न थे।चंदेरी के गुर्जर-प्रतिहार राजाओं के बारे में बहुत ज्यादा नहीं मालूम है सिवाय चंदेरी में पाये गये एक शिलालेख के अलावा।यह पत्थर का शिलालेख मूलतः एक मध्यकालीन मंदिर में पाया गया था जो अब अस्तित्व में नहीं है और अब ग्वालियर संग्रहालय में संरक्षित है। इसमें चंदेरी पर शासन करने वाले13 गुर्जर-प्रतिहार राजाओं के नाम का उल्लेख है, लेकिन विस्तार से केवल राजा कृतिपाल, सातवें राजा, के जीवन का वर्णन है। इस शिलालेख के अनुसार, राजा कृतिपाल ने अपने नाम पर तीन संस्थाओं का निर्माण किया- कीर्ति दुर्ग, कीर्ति नारायण और कीर्ति सागर। कीर्ति नारायण एक वैष्णव मंदिर था जो या तो किले के परिसर के अंदर या किले के नजदीक बनाया गया था, जो दुर्भाग्य से, अब मौजूद नहीं है। कीर्ति सागर किले के पास स्थित तालाब के लिए प्रयोग होता है।

लिखित साक्ष्य के अभाव में चंदेरी में गुर्जर-प्रतिहार के शासन के पूरे विवरण स्पष्ट नहीं है। हालांकि ऐसा कहा जाता है कि 11 वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में गुर्जर-प्रतिहार राजवंश का पतन शुरू हुआ और उनके अधिकांश क्षेत्र, चंदेरी सहित, कछवाड़ा राजपूतों, द्वारा जब्त कर लिया गया था, जिन्होने नारवार को अपनी राजधानी बनायी।

चंदेरी शहर दिल्ली के सल्तनत की हो गयी जब ग्यासुद्दीन बलबान, सुल्तान नसीरुद्दीन के एक मंत्री ने सन् 1251-1252 ई. में चंदेरी पर हमला किया। लेकिन बलबान के दिल्ली लौटने के साथ ही, स्थानीय शासकों का अधिकार लौट आया।

जब अलाउद्दीन खिलजी सन् 1296 ई. में दिल्ली के सुल्तान बने, उन्होंने एक विजय अभियान चलाया और चंदेरी, विदिशा, उज्जैन, धार नगरी, मांडू और मालवा पर कब्जा किया। अगले दशक में, चंदेरी पर सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक के नेतृत्व में तुगलक राजवंश के द्वारा कब्जा कर लिया गया।

सन्1342 ई. में, प्रसिद्ध यात्री और इतिहासकार, इब्न बतूता, चंदेरी से होकर गुजरा और अपने अनुभवों के बारे में लिखा। उसने चंदेरी को भारत के बड़े शहरों में से एक बहुत सारे लोगों और वस्तुओं से भरा एक विशाल बाजार के रूप में वर्णित किया।

दिलावर खान गोरी, मालवा में दिल्ली सल्तनत के गवर्नर, सन्1392 ई. में दिल्ली सल्तनत से अपनी स्वतंत्रता घोषित की और मालवा सल्तनत की स्थापना की। उसका पुत्र, होशांग शाह, सन्1404 ई. में सुल्तान बन गया व मांडू में अपनी राजधानी बनायी, जबकि उनके छोटे भाई कादर खान ने चंदेरी में एक प्रतिद्वंद्वी सल्तनत की स्थापना की। हालांकि सन् 1424 ई. में, चंदेरी मालवा सल्तनत में शामिल कर लिया गया था।

सन् 1520 ई. में दिल्ली के सिकंदर लोदी के एक एक संक्षिप्त शासन के बाद, चंदेरी, राणा सांगा, चित्तौड़ के राजा के के कब्जे में आ गया। राणा सांगा ने मेदिनी राय, अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक पर, चंदेरी के शासन का भार सौंप दिया। मेदिनी राय ने चंदेरी पर सन्1528 ई. तक शासन किया, जब मुगल सम्राट बाबर के नेतृत्व में हुये हमले में उसने चंदेरी के किले पर कब्जा करने में सफलता पायी।

सन् 1530 ई. में बाबर की मृत्यु के बाद, उसका बेटा हुमायूं सम्राट बना। सन् 1538 ई. में, हुमायूं का शासनकाल शेर शाह सूरी के आक्रमण से थम गया जिसने सत्ता छीन ली और खुद को मुगल साम्राज्य के सम्राट के रूप में घोषित कर दिया। हुमायूं फारस पलायन करने को मजबूर हो गया। शेर शाह सूरी ने रायसेन के राजा, पूरणमल को चंदेरी के राज्यपाल के रूप में स्थापित किया है और वह शुजात खान, जो सन् 1546 ई. तक इस पद पर आसीन रहा।

हुमायूं सन्1546 ई. में शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद भारत लौट आया। इसी समय मल्लू खान, जो उस समय का मालवा सुल्तान था, ने चंदेरी पर कब्जा कर लिया। इसकी प्रतिक्रिया में, हुमायूं ने अपने भाइयों, असकरी बाग और हिंदल मिर्जा, को शहर पर फिर से कब्जा करने को भेजा।हुमांयू के बाद, उसका बेटा अकबर सन् 1555 ई. में मुगल साम्राज्य का सम्राट बना। उसने सन् 1569 ई. में चंदेरी पर कब्जा किया और इसे मालवा सूबे का एक सरकार (महत्वपूर्ण केंद्र) बनाया। सन् 1605 ई. में, मुगल दरबार की तरफ से, जहांगीर ने चंदेरी के शासन को बुंदेला राजपूतों को सौंप दिया।

महाराजा रूद्रप्रताप सिंह, हेमकरण के एक वंशज ने सन् 1531 ई. में ओरछा शहर की स्थापना की और उसे बुंदेलखंड की राजधानी बनायी। चंदेरी पर बुंदेला शासन के गौरवशाली साल से पहले एक लड़ाई हुई थी। बुंदेला शासन के दो भाईयों – राम बुंदेला शाह और वीर सिंह बुंदेला – के बीच हुई लड़ाई। राम शाह, बड़े भाई, को ओरछा विरासत में मिला और वीर सिंह को छोटा जागीर बदोनी दिया गया था। वीर सिंह इस व्यवस्था से असंतुष्ट था और अपने भाई को गद्दी से उतारने की साजिश रची। वीर सिंह मुगल राजकुमार जहांगीर के साथ मिल गया और उसे सन् 1602 ई. में अबुल फजल की हत्या में मदद की। जहांगीर ने तब बुंदेलखंड की राजधानी – ओरछा – को सन् 1605 ई. में वीर सिंह को दे दिया और इसके विपरीत उसने राम शाह को पदावनत कर स्थानांतरित कर दिया, जिससे चंदेरी में बुंदेला शासन के 253 साल शुरू हो गये।

जब राम शाह ने चंदेरी का अधिग्रहण किया, यह एक दु: खद स्थिति में था. कीर्ति दुर्ग किला और शहर के महलों में से अधिकांश जीर्ण – शीर्ण हालत में थे। चंदेरी की हालत से अत्यंत परेशान और अपने भाई के विश्वासघात से दुःखी, उसने सन् 1606 ई. में ओरछा के पुनर्ग्रहण की कोशिश की, लेकिन हार गया और युद्धबंदी के रूप में कब्जा कर लिया गया। लेकिन सन् 1607 ई. में, जहांगीर ने उनकी रिहाई के लिए आदेश जारी किए और चंदेरी के राज्यक्षेत्र उसे लौटा दिया।

राम शाह ने अगले 22 वर्षों तक चंदेरी और आस-पास के क्षेत्रों पर शासन किया। उन्होंने चंदेरी से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ललितपुर में अपना निवास बनाया, और चंदेरी के कई स्मारकों और इमारतों के मरम्मत के लिए अपनी ऊर्जा और संसाधनों का को समर्पित किया। राम शाह की सन् 1628 ई. में मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसके बड़े बेटे, संग्राम शाह, को चंदेरी का शासक बनाया गया।

महाराजा संग्राम शाह एक सक्षम और कुशल शासक होने के अलावा, एक बहादुर और साहसी आदमी के रूप में जाना जाता था उन्होंने मुगल सम्राट शाहजहां के साथ अच्छे संबंध बनाये और अपनी शक्ति बढ़ाई। उसने सैन्य अभियानों में मुगल बादशाह की सहायता की और उनकी भागीदारी उपयोगी साबित हुई, जिसके परिणामस्वरूप कई जीतें हुईं। ऐसी ही एक जीत लाहौर में सूबेदार जमान बेग मिर्जा की सेना के खिलाफ थी। लड़ाई के दौरान संग्राम शाह के हाथ में गोली लग गयी थी, लेकिन वह लगातार लड़ता रहा। उसने अपनी बहादुरी के लिए वाहवाही जीता और वह चंद्रवली के शाही खिताब से नवाजा गया था। इस से संबंधित एक शिलालेख महरौली, नई दिल्ली में लौह स्तंभ पर देखा जा सकता है। संग्राम शाह की सन् 1641 ई. में मृत्यु हो गई और उसके सबसे बड़े बेटे भरत शाह ने गद्दी संभाली।

भरत शाह को सन् 1642 ई. में चंदेरी का राज्य विरासत में मिला और अपने पूर्ववर्ती की तरह वह शाहजहां के साथ हाथ मिलाया। उसकी सन् 1654 ई. में मृत्यु हो गई और उसके पुत्र देवी सिंह बुंदेला को राजा बनाया गया।

महाराजा देवी सिंह ने प्रशासनिक तंत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किये और एक बड़े पैमाने पर भवनों के निर्माण का चलाया, जिसमें से सिंहपुर ग्राम, बाबा की बावड़ी और पैठानी मोहल्ला मस्जिद विशेष उल्लेख के लायक हैं। उसके शासनकाल के दौरान, चंदेरी में 17 परगना शामिल हो गये और वार्षिक आय के 22 लाख होने का अनुमान किया गया था। उसने ओरछा में उभरे गृहयुद्ध को दबाने में सम्राट औरंगजेब की सहायता की। महाराजा देवी सिंह एक महान विद्वान और लेखक भी थे और अपने समय के प्रसिद्ध ग्रंथों में से कुछ को लिखा। उनमें से सबसे प्रसिद्ध आयुर्वेद विलासंद देवी सिंह निदान था। अद्वितीय प्रगति और सांप्रदायिक सद्भाव के माहौल में उसके शासनकाल का अंत सन्1663 ई. में हो गया जब उसकी मृत्यु हुई।

दुर्ग सिंह ने आगे अपने पिता, देवी सिंह, की विरासत को बरकरार रखा तथा इसके परिणामस्वरूप चंदेरी का विकास जारी रहा। अपने पिता की तरह, दुर्ग सिंह भी सम्राट औरंगजेब के साथ संबद्ध रहा और उसने बंजारा विद्रोह को दबाने में महत्वपूर्ण मदद की और औरंगजेब के मराठों के खिलाफ सैन्य अभियान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन् 1673 में, एक मराठा शासक, शंकर राव, ने चंदेरी पर हमला किया लेकिन उसे दुर्ग सिंह और उसकी सेना के हाथों हार स्वीकार करनी पड़ी थी। वह सन् 1687 ई. में अपनी मृत्यु तक 24 वर्षों तक शासन करता रहा और उसके बाद उसके बेटे दुर्जन सिंह राजा बना।

दुर्जन सिंह उस समय सिंहासन पर बैठा जब मुगल साम्राज्य का प्रभाव घटना शुरू हो गया था। औरंगजेब का डेक्कन अभियान साम्राज्य के लिए एक भारी झटका साबित हुआ और खजाने को बहुत हद तक सूखा दिया। सन् 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद साम्राज्य अस्त-व्यस्त हो गया था। इसलिए दुर्जन सिंह ने मुगलों के साथ सभी संबंधों को तोड़ने का फैसला किया। लेकिन जब चंदेरी पर मराठा राजकुमार, पंडित गोबिंदराज द्वारा हमला किया गया था, मुगल शासकों ने दुर्जन सिंह को मुगल साम्राज्य को एक बार फिर समर्थन को लुभाने हेतू दूत भेजा। मुगलों और दुर्जन सिंह के दोहरे ताकत ने मराठों को दूर रखा।

दुर्जन सिंह के शासनकाल के दौरान राज्य की आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सार्वजनिक कार्यों के विकास के लिए उपयोग किया गया था, और कई धार्मिक और लोकोपयोगी संरचनाओं निर्माण किया गया है। दुर्जन सिंह ने चंदेरी 14 साल से अधिक सन् 1733 ई. में उनकी मृत्यु तक शासन किया, जिसके बाद उसके ज्येष्ठ पुत्र, मान सिंह, ने पदभार संभाल लिया।

मान सिंह एक कुशल प्रशासक के रूप में जाना जाता था और उसके सबसे बड़े बेटे, अनिरुद्ध सिंह, ने उसके बाद राजा बना। अनिरुद्ध सिंह ने मुगल साम्राज्य के साथ सारे संबंधों को काटने में कामयाब रहा और चंदेरी पर 28 साल तक शासन किया। वह एक बहुत धार्मिक व्यक्ति के रूप में जाता था और परमेश्वर तालाब के किनारे पर अपने पूर्वजों के स्मारकों के निकट लक्ष्मण मंदिर का निर्माण किया। अनिरुद्ध सिंह की सन् 1774 ई. में मृत्यु हो गई और उसके बेटे, रामचन्द्र, ने बागडोर संभाल लिया।

रामचन्द्र का शासन कुशासन और अराजकता से भरा था। उन्होंने अपने चाचा हटे सिंह को मार डाला, जिससे शाही परिवार के भीतर एक बड़ी दरार पैदा हो गयी। इसके परिणामस्वरूप प्रशासन लगभग टूटने के कगार पर आ गया और चंदेरी गर्त के रास्ते पर आ गया। रामचंद्र अपने परिवार के साथ अयोध्या चले गए। शाही अधिकारियों के कहने पर, उसने सन् 1791 ई. में चंदेरी के शासक के रूप में अपने बेटे प्रजापाल को नियुक्त किया।

प्रजापाल सिंह ने चंदेरी में स्थिति का विश्लेषण कर शहर को इसके पूर्व गौरव में बहाल करने की कसम खाई। उसने अपना केंद्र ललितपुर बनाया और चंदेरी में जो बुंदेला साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे थे उन क्रांतिकारियों का सफलतापूर्वक सामना किया। वह चंदेरी में तब लौटा जब यह फिर से एक संपन्न शहर बन गया। वह काफी हद तक अपनी शक्ति को मजबूत करने में कामयाब रहा, लेकिन उसके बहुत से दुश्मन बन गये। सन् 1802 ई. में उसकी हत्या कर दी गई जबकि वो एक शिकार पर थे।

मौद प्रहलाद, प्रजापाल का छोटा भाई, सन् 1802 ई. में सिंहासन पर बैठा। विलासिता से अभिभूत होकर, वह ज्यादतियों में लिप्त हो गया। इसके परिणामस्वरूप राज्य का प्रशासन तितर-बितर हो गया। सन् 1811 ई. में, चंदेरी किले को कर्नल जॉन बैप्टिस्ट फिलोस द्वारा दौलत राव सिंधिया के लिए ले लिया गया था और सिंधिया राज्य में चंदेरी को शामिल कर लिया गया था। ग्वालियर के सेना के हमले का सामना करने में असमर्थ, मौद प्रहलाद झाँसी भाग गए और दौलत राव सिंधिया ने चंदेरी के राज्यपाल के रूप में उसी वर्ष कर्नल बैप्टिस्ट फिलोस को नियुक्त कर दिया। मौद प्रहलाद को बाद में बानपुर और तलबाहत के आसपास के क्षेत्र में 31 गांवों के एक छोटा सा जागीर प्रदान की गई थी। सन्1838 ई. में, मौद प्रहलाद को बानपुर का राजा बनाया गया था। उसकी सन् 1842 ई. में मृत्यु हो गई और उसके स्मारक को बानपुर के गांव में देखा जा सकता है।

कुंवर मर्दन सिंह, बुंदेला शासकों में सबसे अंतिम शासक, सन्1802 ई. में पैदा हुआ था। उसके जन्म के समय, चंदेरी गरीबी से गुजर रहा था और प्रशासन की हालत खस्ता थी। उनके क्षेत्राधिकार के क्षेत्र तलबाहाट के पास एकमात्र जागीर थी और बानपुर गांव ही उसके नाम पर था। मर्दन सिंह कुशाग्र प्रशासनिक और सैन्य बुद्धि का मालिक था और उसने तेजी से राजनीतिक हलकों में सम्मान पाया। उन्होंने चंदेरी के सबसे कुख्यात डकैतों में से कुछ को कब्जा कर लिया और उन्हें ललितपुर में कमिशनर हैमिल्टन को सौंप दिया। इसके परिणामस्वरूप मर्दन सिंह ने न केवल चंदेरी में वाहवाही अर्जित वरन् झांसी और ग्वालियर में भी। उसने तब तलहाबात पर आक्रमण किया और आसपास के क्षेत्रों पर भी नियंत्रण प्राप्त कर लिया। सन् 1844 ई., में जनकौजी राव सिंधिया की मौत के कारण, सिंधिया परिवार और ब्रिटिश राज के बीच एक दरार पैदा हो गयी। मर्दन सिंह ने इस स्थिति का फायदा उठाया और चंदेरी पर कब्जा कर लिया। इन सफलताओं ने उनका हौसला बढ़ाया, मर्दन सिंह ने अपने निजी सेना का विस्तार किया और अपने कर्मियों के प्रशिक्षण में फ्रांस के अधिकारियों की मदद मांगी। उसकी सेना इस तरह शक्ति और रणनीति दोनों के संदर्भ में बेहतर बन गयी और सन् 1857 ई. के विद्रोह में कूद पड़ी।

मर्दन सिंह विद्रोह में अपनी सेना का कुशल कप्तान साबित हुआ और झांसी की रानी, रानी लक्ष्मीबाई, के साथ मिल गया। ब्रिटिश सेनाओं ने चंदेरी पर कब्जा कर लिया लेकिन मर्दन सिंह ने अपनी सेना के साथ उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। सन् 1858 ई. में सेंट पैट्रिक दिवस पर, ब्रिटिश सेना ने सर ह्यूग रोज को उनकी बटालियन, रॉयल काउण्टीडाउन , के साथ खातकर चंदेरी पर कब्जा करने के उद्देश्य के साथ भेजा। हमले 17 मार्च को शुरू हुआ और अथक फायरिंग से किले के सुरक्षा दीवार के बीच में एक बड़ी दरार पड़ गया। मार्च 17, सन् 1858 ई. की सुबह में, ब्रिटिश सेनाओं ने इस दरार के माध्यम से किले में प्रवेश किया और दोनों समूहों के बीच तेजी से एक लड़ाई छिड़ गयी। कैप्टन कीटिंग इसमें गंभीर रूप से घायल हो गये और एक अधिकारी के साथ 28 सैनिकों को मार डाला गया। लेकिन रॉयल काउण्टीडाउन अंत में प्रबल साहित हुई और चंदेरी के राज्यक्षेत्र को जीत लिया। मर्दन सिंह को जेल में रखा गया और अपने जीवन के बाकी समय के लिए बाद में उनको वृंदावन भेजा गया। यह चंदेरी में बुंदेला शासन के अंत के रूप में चिह्नित किया गया।

चंदेरी को सन् 1857 ई. के विद्रोह के दौरान बहुत नुकसान का सामना करना पड़ा, यह लगातार लुटा गया और आंशिक रूप से जला दिया गया। 12 दिसंबर, सन् 1860 ई. को एक ब्रिटिश और सिंधिया की सेनाओं के बीच हस्ताक्षरित संधि के बाद, चंदेरी को ग्वालियर स्टेट को लौटा दिया गया था। सन् 1947 ई. के बाद ग्वालियर, जो चंदेरी की रियासत में शामिल था नवगठित मध्य भारत राज्य का एक हिस्सा बन गया जो बाद में पुनर्गठन के बाद मध्य प्रदेश बना।

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