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Hazrat Wajihuddin Tomb,Chanderiहजरत वजीहुद्दीन यूसुफ दिल्ली के निकट कलकाहारी में वर्ष 1260 में पैदा लिये थे, जहाँ उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्ष बिताये। जवान होकर वह दिल्ली के लिये कूच कर गये जहां वे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के एक शिष्य बन गये। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान, हजरत निजामुद्दीन ने हज़रत वजीहुद्दीन को चंदेरी की देखरेख करने व वहाँ के लोगों की सेवा करने के लिए भेजा। हजरत वजीहुद्दीन सन् 1305 ई. में चंदेरी पहुँच गए और जल्द ही न केवल चंदेरी वरन् अन्य स्थानों से भी हजारों श्रद्धालु का आदर प्राप्त कर लिया जो अक्सर उनके खानखाह पर आने लगे।

प्रांत का तत्कालीन गवर्नर, मलिक तमर हजरत वजीहुद्दीन की लोकप्रियता से जलने लगा और अपनी सेना को उकसाया कि वो खानखाह व उनके भक्तों पर हमला करे। स्थिति इतनी अस्थिर हो गयी कि को सलाह दी गयी कि हज़रत वजीहुद्दीन पास स्थित लखनोटी में स्थानान्तरित हो जायें। उन्होंने दिल्ली जाकर हज़रत निज़ामुद्दीन से मार्गदर्शन माँगा तथा महसूस किया कि उन्हें चंदेरी के लोगों की सेवा करने की जिम्मेदारी दी गई थी और उन्हें इसे पूरा करना था। वे चंदेरी लौट आए, जहाँ उन्होने एक नया खानखाह बनवाया और सन् 1328 ई. में अपने निधन तक सेवा को जारी रखा।

हजरत वजीहुद्दीन की दरगाह राजघाट रोड के पास है। उनकी कब्र के आसपास उनके सबसे समर्पित अनुयायियों की मजारे हैं। आज भी लोग अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने और आशीर्वाद लेने आते हैं।

27 से 29 मार्च तक प्रत्येक साल उर्स मनाया जाता है जहाँ उनके भक्त दरगाह में झुंड के झुंड आते है और चादर चढाते हैं व अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते है।

इस दरगाह के बाईं ओर दो अन्य मुस्लिम संतों के मौसोलियम हैं। जाली का सजावटी काम और उनकी दीवारों पर जो नक्काशी की गयी है वो निजामुद्दीन के कब्रों की भांति भव्य है। लेकिन ये संरचनाएँ ढहने वाली हैं और इन्हें संरक्षित करने व सम्मान देने की ज़रूरत है।

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